August 2, 2026

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E20 पेट्रोल की मिलावट: पर्यावरण सुधार का दावा या करोड़ों पुरानी गाड़ियों के लिए बनता जा रहा ‘साइलेंट किलर’?

 

लेखक लवप्रीत सिंह

भारत सरकार ने देश के ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने के उद्देश्य से पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने (E20 Fuel) की महत्वाकांक्षी योजना को पूरे देश में लागू कर दिया है। नीतिगत और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से सरकार इसे एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम मानकर अपनी पीठ थपथपा रही है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस कदम से न केवल देश के हजारों करोड़ रुपये के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत हो रही है, बल्कि गन्ना किसानों को सीधे तौर पर एक बड़ा आर्थिक संबल भी मिल रहा है।
हालांकि, इस नीति के क्रियान्वयन का दूसरा पहलू बेहद चिंताजनक और डराने वाला है। जमीनी स्तर पर देश के करोड़ों वाहन मालिकों, गैराज संचालकों और ऑटोमोबाइल मैकेनिकों के बीच E20 ईंधन को लेकर एक गहरा असंतोष और आक्रोश पनप रहा है। राजधानी लखनऊ सहित देश के विभिन्न महानगरों के पेट्रोल पंपों पर अब सामान्य पेट्रोल की जगह केवल एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ही उपलब्ध है। इस स्थिति ने उन करोड़ों वाहन स्वामियों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, जिनकी गाड़ियाँ अप्रैल 2023 से पहले की निर्मित हैं और इस नए हाइब्रिड ईंधन को झेलने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम नहीं हैं। ऑटो सेक्टर से जुड़े विशेषज्ञों और मैकेनिकों का साफ कहना है कि E20 पेट्रोल पुरानी गाड़ियों के इंजन और फ्यूल सिस्टम के लिए एक ‘साइलेंट किलर’ यानी धीमा जहर साबित हो रहा है, जो गाड़ियों को अंदर ही अंदर पूरी तरह खोखला कर रहा है।
देशभर के आम नागरिक, जो रोज़मर्रा के काम के लिए अपनी बाइक, स्कूटर या कार पर निर्भर हैं, इस नए ईंधन के दुष्परिणामों को अपनी जेब पर महसूस कर रहे हैं। बिना किसी पूर्व चेतावनी या आम जनता को कोई दूसरा विकल्प दिए, सभी पेट्रोल पंपों पर एथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन अनिवार्य कर दिया गया है। इसके कारण वाहन मालिकों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है—एक तरफ पेट्रोल की कीमतें कम नहीं हो रही हैं, और दूसरी तरफ गाड़ियों के माइलेज में भारी गिरावट आ चुकी है।
दिल्ली के एक निजी बैंक में कार्यरत कार मालिक अमित शर्मा ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि उनके पास साल 2019 मॉडल की एक सेडान कार है। जब से पेट्रोल पंपों पर यह नया एथेनॉल वाला पेट्रोल मिलना शुरू हुआ है, तब से उनकी कार का माइलेज अचानक 15 से 20 प्रतिशत तक गिर गया है। जो कार पहले दिल्ली के ट्रैफिक में आसानी से 14 किमी प्रति लीटर का माइलेज देती थी, वह अब मुश्किल से 11 या 12 का माइलेज दे पा रही है। सरकार कह रही है कि इससे प्रदूषण कम हो रहा है, लेकिन एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के बजट का क्या? ईंधन पर होने वाला उनका मासिक खर्च सीधे तौर पर दो से तीन हजार रुपये बढ़ गया है, जबकि पेट्रोल की प्रति लीटर कीमत में एक पैसे की भी कटौती नहीं की गई है।
यही हाल दोपहिया वाहन चालकों का भी है। लखनऊ के गोमती नगर इलाके में रहने वाले और पेशे से सेल्स एग्जीक्यूटिव राजेश कुमार अपनी बाइक से रोज़ाना 60 से 70 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। उन्होंने बताया कि सुबह के समय या सर्दियों के मौसम में गाड़ी स्टार्ट करना एक दुःस्वप्न बन गया है। किक मारते-मारते पैर थक जाता है, लेकिन गाड़ी स्टार्ट नहीं होती। अगर स्टार्ट हो भी जाए, तो शुरुआती कुछ किलोमीटर तक इंजन लगातार मिसफायर करता है, झटका लेता है और बीच रास्ते में किसी भी चौराहे पर अचानक बंद हो जाता है। उन्हें कई बार अपनी बाइक को मैकेनिक के पास ले जाना पड़ा है, और हर बार वे कहते हैं कि पेट्रोल में खराबी के कारण ऐसा हो रहा है।
वाहन स्वामियों की इन शिकायतों के पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। ऑटोमोटिव विशेषज्ञों के अनुसार, एथेनॉल की कैलोरीफिक वैल्यू (ऊर्जा उत्पादन क्षमता) शुद्ध गैसोलीन या पेट्रोल की तुलना में लगभग 33 प्रतिशत कम होती है। इसका सीधा मतलब यह है कि समान मात्रा में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल जलाने पर इंजन उतनी ऊर्जा पैदा नहीं कर पाता, जितनी वह शुद्ध पेट्रोल से करता है। परिणामतः, गाड़ी को उतनी ही दूरी तय करने के लिए अधिक ईंधन की खपत करनी पड़ती है, जिससे माइलेज का गिरना पूरी तरह स्वाभाविक और गणितीय रूप से तय है।
पंपों पर E20 पेट्रोल आने के बाद से देश के ऑटो गैराजों और सर्विस सेंटरों पर गाड़ियों की भीड़ अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। विशेष रूप से अप्रैल 2023 से पहले निर्मित गाड़ियाँ (जो BS3, BS4 या शुरुआती BS6 फेज-1 मानकों वाली हैं) सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। इन गाड़ियों के इंजन, फ्यूल टैंक और पाइपलाइन को बनाते समय इस बात का अंदाजा नहीं था कि भविष्य में इन्हें 20 प्रतिशत एथेनॉल वाले ईंधन पर चलाया जाएगा।
लखनऊ के एक प्रतिष्ठित और पुराने ऑटो गैराज के संचालक, सीनियर ऑटो मैकेनिक मोहम्मद अकरम ने एथेनॉल से होने वाले नुकसानों का विस्तृत तकनीकी विश्लेषण करते हुए बताया कि एथेनॉल की सबसे बड़ी रासायनिक कमजोरी यह है कि यह ‘हाइग्रोस्कोपिक’ प्रकृति का होता है। इसका मतलब है कि यह हवा में मौजूद नमी यानी पानी को अपनी तरफ बहुत तेजी से खींचता है। जब गाड़ी का पेट्रोल टैंक आधा खाली होता है, तो उसमें मौजूद हवा की नमी को पेट्रोल का एथेनॉल सोख लेता है। समय के साथ यह पानी पेट्रोल से अलग होकर टैंक के सबसे निचले हिस्से में जमा होने लगता है। इसके दो बेहद खतरनाक परिणाम होते हैं—पहला, लोहे के फ्यूल टैंक के अंदरूनी हिस्सों में बहुत तेजी से जंग लगने लगती है। दूसरा, यह जंग और पानी जब फ्यूल पंप और फ्यूल इंजेक्टर तक पहुँचते हैं, तो उन्हें पूरी तरह चोक यानी जाम कर देते हैं। उनके पास पिछले कुछ महीनों में दर्जनों ऐसी कारें और मोटरसाइकिलें आई हैं, जिनके महंगे फ्यूल इंजेक्टर और पंप इस जंग के कारण पूरी तरह बर्बाद हो चुके थे और जिन्हें बदलना पड़ा।
एक अन्य व्यस्त इलाके के गैराज ओनर संजय यादव ने एथेनॉल के सॉल्वेंट (घोलक) गुणों के कारण होने वाले नुकसान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एथेनॉल एक बेहद शक्तिशाली सॉल्वेंट या क्लीनिंग एजेंट की तरह काम करता है। पुरानी गाड़ियों के फ्यूल सिस्टम में कई जगह रबर की पाइपें, सील, गैस्केट और प्लास्टिक के ओ-रिंग्स का इस्तेमाल किया जाता है। जब इन पुर्जों पर लगातार 20% एथेनॉल वाला पेट्रोल दबाव डालता है, तो यह रबर और प्लास्टिक को धीरे-धीरे गलाना और काटना शुरू कर देता है। रबर के गलने से वह चिपचिपा हो जाता है और उसके बारीक कण इंजन के अंदरूनी हिस्सों, जैसे पिस्टन और वॉल्व पर जाकर चिपक जाते हैं, जिससे वहां भारी मात्रा में कार्बन जमा हो जाता है। इससे भी बड़ा खतरा यह है कि रबर की पाइपों के गलने या फटने से फ्यूल लीक होने की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जो किसी भी चलती गाड़ी में अचानक आग लगने का कारण बन सकती हैं। पुरानी गाड़ियों के पुर्जे इस केमिकल अटैक को सहने के लिए डिजाइन ही नहीं किए गए थे।
मैकेनिकों के अनुसार, फ्यूल पंप का खराब होना, इंजेक्टर का चोक होना और इंजन हेड पर कार्बन का जमना अब एक आम समस्या बन चुकी है। इन पुर्जों को बदलवाने का खर्च भी काफी अधिक होता है। एक सामान्य मध्यमवर्गीय कार मालिक के लिए फ्यूल पंप और इंजेक्टर बदलवाने का खर्च 15,000 से 25,000 रुपये तक आ सकता है, जो कि पूरी तरह से एक अनपेक्षित आर्थिक झटका है।
इन तमाम शिकायतों, जमीनी समस्याओं और विवादों के बीच, केंद्र सरकार, संबंधित मंत्रालयों और ऑटोमोबाइल निर्माताओं के शीर्ष संगठन का रुख पूरी तरह से अलग और नीति-केंद्रित है। सरकार इस कदम को देश के व्यापक आर्थिक और पर्यावरणीय हित में एक अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में देख रही है।
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों के आधिकारिक बयानों के अनुसार, पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण की नीति देश के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। सरकार का सबसे बड़ा तर्क पर्यावरण और देश की अर्थव्यवस्था को लेकर है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसके लिए हर साल अरबों डॉलर का भुगतान करना पड़ता है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल के आयात में सीधे तौर पर कमी लाने का रास्ता साफ हुआ है। सरकार का दावा है कि इससे देश के हजारों करोड़ रुपये के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत हो रही है, जिसका उपयोग देश के अन्य बुनियादी ढांचे जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़कों के विकास में किया जा सकता है।
इसके अलावा एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने के रस, शीरे, और खराब या अधिशेष अनाज (जैसे मक्का और टूटे चावल) से किया जाता है। एथेनॉल की मांग बढ़ने से देश के चीनी मिलों और किसानों को एक नया और सुनिश्चित बाजार मिला है। केंद्रीय मंत्रियों का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के माध्यम से अब तक हजारों करोड़ रुपये का भुगतान सीधे गन्ना किसानों के बैंक खातों में किया गया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व मजबूती मिली है। साथ ही शुद्ध पेट्रोल की तुलना में एथेनॉल एक स्वच्छ ईंधन है। जब एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल जलता है, तो हवा में कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन और अन्य हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन काफी हद तक कम हो जाता है। महानगरों में बढ़ते वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती से निपटने के लिए सरकार इस नीति को बेहद जरूरी मानती है।
सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों ने भी इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। कंपनियों का कहना है कि सरकार की इस नीति को ध्यान में रखते हुए ऑटोमोबाइल उद्योग ने समय रहते अपनी तकनीकों में बड़े बदलाव किए हैं। ऑटो उद्योग के आधिकारिक बयानों के मुताबिक अप्रैल 2023 के बाद से देश में बेची जाने वाली सभी नई गाड़ियाँ पूरी तरह से ‘E20 कंप्लायंट’ या एथेनॉल अनुकूल हैं। इन वाहनों के फ्यूल टैंक अब जंग-रोधी विशेष कोटिंग वाले धातुओं या उच्च गुणवत्ता वाले प्लास्टिक से बनाए जा रहे हैं। साथ ही, इनमें इस्तेमाल होने वाली पाइपलाइन, सील और गैस्केट में ऐसे रबर और पॉलिमर का उपयोग किया गया है, जिन पर एथेनॉल के सॉल्वेंट गुण का कोई असर नहीं होता।
इसके साथ ही नए वाहनों के इंजन कंट्रोल मॉड्यूल को E20 ईंधन के अनुसार ट्यून किया गया है, ताकि वे कम कैलोरीफिक वैल्यू के बावजूद इंजन की कार्यक्षमता और माइलेज को संतुलित रख सकें। कंपनियों का दावा है कि इन नए वाहनों में इंजन खराब होने, पुर्जे गलने या स्टार्टिंग में परेशानी होने जैसी कोई समस्या कभी नहीं आएगी। उद्योग जगत और सरकारी परीक्षण प्रयोगशालाओं का मानना है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ियों के माइलेज में केवल 3 से 6 प्रतिशत की ही मामूली गिरावट आ सकती है। वाहन स्वामियों द्वारा बताई जा रही 15 से 20 प्रतिशत की गिरावट के पीछे गाड़ियों के समय पर मेंटेनेंस न होने, खराब ड्राइविंग आदतों या ट्रैफिक जाम जैसे अन्य बाहरी कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।
यद्यपि सरकार और नए वाहन निर्माताओं के तर्क अपनी जगह मजबूत हो सकते हैं, लेकिन इस पूरी नीतिगत बहस में सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न देश की सड़कों पर दौड़ रहे उन करोड़ों पुराने वाहनों का है, जो अप्रैल 2023 से पहले खरीदे गए थे। भारत में एक मध्यमवर्गीय परिवार गाड़ी को कम से कम 10 से 15 साल तक चलाता है। अचानक ईंधन का स्वरूप बदल दिए जाने से इन लोगों के सामने अपनी चालू गाड़ियों के कबाड़ होने या लगातार महंगे रिपेयरिंग के चक्रव्यूह में फंसने का खतरा पैदा हो गया है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाने चाहिए थे। उदाहरण के लिए, पेट्रोल पंपों पर कम से कम एक नोजल ‘शुद्ध पेट्रोल’ (E0) या कम एथेनॉल वाले पेट्रोल का होना चाहिए था, भले ही उसकी कीमत थोड़ी अधिक रखी जाती, ताकि पुराने वाहन मालिकों के पास अपनी गाड़ी की सुरक्षा के लिए एक विकल्प मौजूद रहता। इसके अलावा, ऑटो कंपनियों को पुराने वाहनों के फ्यूल सिस्टम को E20 अनुकूल बनाने के लिए बाजार में किफायती ‘रेट्रोफिट किट’ या पुर्जे उपलब्ध कराने चाहिए।
पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल की मिलावट की यह कहानी नीतिगत आदर्शवाद और जमीनी हकीकत के बीच के बड़े अंतर को बयां करती है। एक तरफ जहां यह कदम देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने और पर्यावरण को स्वच्छ रखने का एक बड़ा जरिया बन रहा है, वहीं दूसरी तरफ पारदर्शी नीति और विकल्पों के अभाव में यह देश के आम नागरिकों की संपत्ति और गाड़ियों के लिए एक बड़ा नुकसान साबित हो रहा है। जब तक सरकार और ऑटो उद्योग मिलकर पुरानी गाड़ियों के संरक्षण और मेंटेनेंस के लिए कोई स्पष्ट गाइडलाइन या तकनीकी समाधान नहीं निकालते, तब तक आम जनता के लिए E20 पेट्रोल एक वरदान कम और गाड़ियों को समय से पहले बर्बाद करने वाला एक ‘साइलेंट किया’ ज्यादा बना रहेगा।