प्लास्टिक का ज़हर: मौत के मुहाने पर जल और जंगल के जीव
स्वतंत्र पत्रकार — लवप्रीत सिंह
आज हमारी ज़िंदगी में प्लास्टिक इतनी गहराई से बस चुका है कि इसके बिना काम चलाना मुश्किल लगता है। सुबह के टूथब्रश से लेकर दूध की थैली, पानी की बोतल और सामान लाने वाले बैग तक—हर जगह प्लास्टिक ही प्लास्टिक है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस्तेमाल करने के बाद जिस प्लास्टिक को हम कचरे में फेंक देते हैं, वह कहां जाता है?
वह प्लास्टिक खत्म नहीं होता, बल्कि हमारी नदियों, समुद्रों और जंगलों में जाकर बेज़ुबान जानवरों के लिए काल बन रहा है।
आसान आंकड़ों में समझें प्लास्टिक का संकट
प्लास्टिक की इस समस्या को कुछ सीधे आंकड़ों से समझा जा सकता है करोड़ों टन कचरा: दुनिया भर में हर साल लगभग 40 करोड़ टन प्लास्टिक बनाया जाता है। इसमें से आधा प्लास्टिक ऐसा होता है जिसे हम केवल एक बार इस्तेमाल करके फेंक देते हैं समुद्र में जाता प्लास्टिक: हर साल करीब 80 लाख से 1.1 करोड़ टन प्लास्टिक समुद्र में बहकर चला जाता है। इसका मतलब है कि हर मिनट कचरे से भरी एक पूरी गाड़ी समुद्र में खाली की जा रही है। जानवरों की मौते: प्लास्टिक प्रदूषण के कारण हर साल 10 लाख से अधिक समुद्री पक्षी और 1 लाख से अधिक समुद्री जीव (जैसे व्हेल, सील और कछुए) अपनी जान गंवा देते हैं।
जल जीवों पर प्लास्टिक का हमला समुद्र, नदियों और तालाबों में रहने वाले जीवों के लिए प्लास्टिक सबसे बड़ा खतरा बन गया है: प्लास्टिक को खाना समझ लेना: समुद्र में बहती हुई प्लास्टिक की थैलियां पानी के अंदर जेलीफिश जैसी दिखती हैं। समुद्री कछुए जेलीफिश को बहुत चाव से खाते हैं। जब वे धोखे से प्लास्टिक बैग खा लेते हैं, तो यह उनके पेट में फंस जाता है। इससे उनका पेट भर जाता है लेकिन शरीर को खाना नहीं मिलता, और वे भूख से तड़प-तड़पकर मर जाते हैं।जाल और रस्सियों में फंसना:
मछुआरों के पुराने टूटे जाल और प्लास्टिक के तार समुद्र में तैरते रहते हैं। कछुए, डॉल्फ़िन और छोटी मछलियां इनमें बुरी तरह उलझ जाती हैं। तैर न पाने के कारण या तो वे डूबकर मर जाती हैं या फिर उनके शरीर पर गहरे ज़ख्म हो जाते हैं। माइक्रोप्लास्टिक का ज़हर: प्लास्टिक कभी पूरी तरह सड़ता या गलका नहीं है। धूप और पानी की लहरों से टूटकर यह बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल जाता है, जिन्हें ‘माइक्रोप्लास्टिक’ कहते हैं। मछलियां इन बारीक टुकड़ों को पानी के साथ निगल लेती हैं। जब इंसान इन मछलियों को खाते हैं, तो वह प्लास्टिक घूम-फिरकर इंसान के शरीर में भी पहुँच जाता है। वन्य जीवों पर प्लास्टिक का असर
प्लास्टिक केवल समुद्र तक सीमित नहीं है। हमारे शहरों के आसपास के जंगलों और मैदानों में रहने वाले जानवर भी इसका शिकार हो रहे हैं:
गाय और आवारा पशु: शहरों और कस्बों में लोग बचा हुआ खाना या सब्जियां प्लास्टिक की थैलियों में बांधकर फेंक देते हैं। गाय, बैल और कुत्ते भोजन की गंध पाकर पूरी थैली ही निगल जाते हैं। यह प्लास्टिक उनके पेट में जमा होकर पत्थर जैसा सख्त बन जाता है, जिससे उनकी दर्दनाक मौत हो जाती है।जंगली जानवर: जंगलों के आसपास या पर्यटन स्थलों पर फेंकी गई प्लास्टिक की बोतलों और चिप्स के रैपर को हिरण, बंदर और हाथी खा लेते हैं। इससे उनकी आंतें बंद हो जाती हैं और पाचन तंत्र काम करना बंद कर देता है।
प्लास्टिक कचरा कितने समय तक नहीं गलता? जिस प्लास्टिक को हम 5 मिनट में इस्तेमाल करके फेंक देते हैं, उसे पूरी तरह नष्ट होने में सैकड़ों साल लग जाते हैं:
प्लास्टिक की थैली: 20 से 50 साल प्लास्टिक का कप: 50 साल पानी की बोतल: 450 साल मछली पकड़ने का प्लास्टिक का जाल: 600 साल इस संकट को रोकने के लिए सरकार के साथ-साथ हमारी अपनी जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी है। अगर हम रोज़मर्रा की जिंदगी में छोटे-छोटे बदलाव करें, तो कई बेज़ुबान जीवों की जान बचाई जा सकती है:
थैला साथ रखें: जब भी बाज़ार जाएं, अपने साथ कपड़े या जूट का थैला ज़रूर ले जाएं। प्लास्टिक की थैली लेने से साफ़ मना करें।
खाना प्लास्टिक में न फेंकें: बचा हुआ खाना कभी भी प्लास्टिक की पन्नी में बांधकर कचरे में न डालें। इसे अलग से किसी बर्तन या खुले स्थान पर रखें ताकि जानवर आसानी से खा सकें।एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक को छोड़ें: प्लास्टिक की डिस्पोजल कटोरी, चम्मच, स्ट्रॉ और पानी की बोतलों की जगह स्टील, कांच या मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करें।
कचरा अलग रखें: सूखा कचरा (प्लास्टिक, बोतलें) और गीला कचरा (सब्जियों के छिलके, बचा भोजन) हमेशा अलग-अलग डिब्बों में रखें रिसाइकलिंग हमारे पर्यावरण, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी है।प्राकृतिक संसाधनों की बचत: नई चीजें बनाने के लिए पेड़ों की कटाई, खनिजों का खनन और पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है। रिसाइकलिंग से पुराने सामान से ही नई चीजें बन जाती हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधन खत्म होने से बचते हैं। ऊर्जा की बचत: किसी चीज को खदानों से निकालकर नए सिरे से बनाने में बहुत अधिक बिजली और ईंधन लगता है। रिसाइकल्ड सामान से नई चीज बनाने में काफी कम ऊर्जा लगती है (जैसे एल्युमिनियम कैन को रिसाइकल करने में नई धातु बनाने की तुलना में लगभग 95% कम ऊर्जा लगती है)।
प्रदूषण में कमी:
कचरा जलाने से हवा में जहरीला धुआं (वायु प्रदूषण) फैलता है। कचरा मैदानों में सड़ने से मीथेन जैसी हानिकारक गैसें और जहरीला रसायन निकलता है, जिससे मिट्टी और भूजल प्रदूषित होता है। रिसाइकलिंग इस प्रदूषण को रोकती है।
कचरे के ढेरों से मुक्ति: शहरों के बाहर बन रहे कचरे के पहाड़ों को कम करने का सबसे असरदार तरीका रिसाइकलिंग ही है।जल-जंतुओं के संरक्षण के लिए सबसे पहला और प्राथमिक कदम कानून व्यवस्था को मजबूत करना है।
सख्त दंड प्रावधान: अवैध शिकार, अवैध मछली पकड़ने (विशेषकर प्रतिबंधित जाल जैसे ट्रॉलर्स और ट्रामेल नेट) और वन्यजीवों की तस्करी पर कड़ी सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए।
कानूनी दायरे का विस्तार: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत केवल कुछ प्रमुख जलीय जीवों (जैसे गंगा डॉल्फिन या समुद्री कछुए) को ही नहीं, बल्कि संकटग्रस्त अन्य सूक्ष्म और दुर्लभ जलीय प्रजातियों को भी शामिल किया जाना चाहिए।निगरानी और प्रवर्तन: समुद्री और नदी पुलिस, कोस्ट गार्ड और वन विभाग को आधुनिक तकनीक, गश्ती नौकाओं और हथियारों से लैस किया जाना चाहिए ताकि वे अवैध गतिविधियों पर पैनी नज़र रख सकें।जलीय प्रदूषण पर नियंत्रण प्रदूषण जल-जंतुओं का सबसे बड़ा दुश्मन है। उद्योगों का जहरीला रसायन, प्लास्टिक कचरा और शहरों का सीवेज सीधे नदियों और समुद्रों में गिरता है, जिससे जल-जंतुओं का दम घुटता है।
औद्योगिक अपशिष्ट पर रोक: सरकार को सभी औद्योगिक इकाइयों के लिए ‘ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ और ‘इफ़्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट’ अनिवार्य करने चाहिए। बिना उपचारित पानी नदियों में बहाने वाली कंपनियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध: प्लास्टिक कचरा (विशेषकर माइक्रोप्लास्टिक) समुद्री जीवन के लिए प्राणघातक सिद्ध हो रहा है। इसके उत्पादन, बिक्री और उपयोग पर कड़ाई से रोक लगाई जानी चाहिए।सीवेज ट्रीटमेंट: शहरी निकायों को आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के लिए पर्याप्त धन और दिशा-निर्देश दिए जाने चाहिए ताकि नालों का गंदा पानी साफ होकर ही जल निकायों में जाए। संरक्षित जलीय क्षेत्रों की स्थापना जिस प्रकार ज़मीन पर राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य बनाए जाते हैं, उसी प्रकार जल-जंतुओं के लिए भी विशेष संरक्षित क्षेत्र घोषित किए जाने चाहिए।
नो-फिशिंग ज़ोन प्रजनन के मौसम में और संकटग्रस्त जीवों के प्राकृतिक आवासों में व्यावसायिक मछली पकड़ने पर पूरी तरह रोक लगानी चाहिए। इको-सेंसिटिव ज़ोन: नदियों के मुहानों, मैंग्रोव वनों और कोरल रीफ (प्रवाल भित्तियों) को संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर वहाँ किसी भी प्रकार के निर्माण या औद्योगिक गतिविधि को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। सतत् मत्स्य पालन नीतियों का विकास
मछली पकड़ने के पारंपरिक और विनाशकारी तरीकों से केवल लक्षित मछलियाँ ही नहीं मारी जातीं, बल्कि बायकैच के रूप में डॉल्फिन, कछुए और छोटे जीव भी जाल में फंसकर मर जाते हैं।
कछुआ रक्षक जाल सरकार को सभी कमर्शियल ट्रॉलर्स में टीईडी का उपयोग अनिवार्य करना चाहिए, जिससे जाल में फंसे कछुए सुरक्षित बाहर निकल सकें।प्रजनन काल में प्रतिबंध: मछलियों के प्रजनन काल (विशेषकर मानसून के दौरान) में तटीय और नदीय क्षेत्रों में मछली पकड़ने पर पूरी तरह से रोक लागू की जानी चाहिए।जल अवसंरचना परियोजनाओं का पर्यावरण-अनुकूल मूल्यांकन
नदियों पर बनने वाले बाँध, बैराज और ड्रेजिंग जल-जंतुओं के प्राकृतिक प्रवाह और प्रवास में बाधा डालते हैं। एनवायरनमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट किसी भी जलीय परियोजना (जैसे जलमार्ग, बाँध या बंदरगाह) को मंज़ूरी देने से पहले उसके पर्यावरणीय प्रभाव की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
फिश पास का निर्माण: बाँधों और बैराजों में ‘फिश लैडर’ या ‘फिश पास’ का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि मछलियाँ और अन्य जीव धारा के विपरीत जाकर आसानी से अंडे दे सकें। अनुसंधान, तकनीक और सामुदायिक भागीदारी केवल कड़े नियम ही पर्याप्त नहीं हैं, संरक्षण प्रयासों में आधुनिक तकनीक और स्थानीय समुदायों को जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है। जीपीएस और सैटेलाइट ट्रैकिंग: संकटग्रस्त जीवों (जैसे व्हेल, डॉल्फिन और कछुओं) की आवाजाही को समझने और उन्हें हादसों (जैसे जहाजों से टक्कर) से बचाने के लिए सैटेलाइट टैगिंग का सहारा लिया जाना चाहिए। मछुआरों का सहयोग और पुनर्वास: तटीय और नदीय क्षेत्रों में रहने वाले मछुआरे जल-जंतुओं के सबसे बड़े रक्षक बन सकते हैं। सरकार को उन्हें जलीय जीवों की सुरक्षा के प्रति जागरूक करना चाहिए और यदि उनके जाल में कोई संरक्षित जीव फंस जाए, तो उसे सुरक्षित छोड़ने पर उन्हें उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए।

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