डॉक्टर सैयद खालिद कैस एडवोकेट
समीक्षक, आलोचक, लेखक
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 21 जुलाई 2026 को विधानसभा में पारित समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक को मुस्लिम समाज के लाख विरोध प्रदर्शन के बावजूद अन्ततः प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने महामहिम राष्ट्रपति की ओर बढ़ा दिया है।अब इस विधयेक पर राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा विचार होगा, क्योंकि मध्य प्रदेश में यह विधेयक समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है। तथा संविधान की अनुच्छेद 200 के तहत राज्य विधानसभा से पारित होने के बाद बिल राज्यपाल के पास गया था। राज्यपाल के पास 3 विकल्प थे, पहला वह हस्ताक्षर कर दे, दूसरा रोक ले, तथा अंतिम राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर दे। विवादित और विरोध के कारण राज्यपाल द्वारा इस विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर दिया है। असल में “समान नागरिक संहिता” UCC जैसा बिल जो हाईकोर्ट/सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, केंद्र के कानूनों (हिन्दू मैरिज एक्ट, शरीयत एक्ट 1937, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम) और संविधान की 5वीं अनुसूची से टकराता है, इसलिए राज्यपाल द्वारा संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर दिया जाता है और स्वयं राज्यपाल खुद हस्ताक्षर नहीं करते। यहां भी प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने 21 जुलाई 2026 को विधानसभा द्वारा पारित समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक को मंजूरी तो दे दी परन्तु आगे की प्रक्रिया के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जा रहा है।
मध्य प्रदेश में UCC के विरोध में मुस्लिम संगठनों द्वारा समान नागरिक संहिता (UCC) के विरुद्ध ठोस संवैधानिक तर्क दिए जा रहे हैं जैसे समान नागरिक संहिता (UCC) संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन है। यह कानून धर्म की स्वतंत्रता पर प्रहार करता है। इस्लाम में निकाह, तलाक, मेहर, विरासत, वसीयत शरीयत का हिस्सा हैं जो धार्मिक आचरण है। UCC इसे हटाकर धर्म के अंतर्गत आने वाले पर्सनल लॉ को खत्म करता है, जो अनुच्छेद 25 (अंतःकरण और धर्म को मानने की स्वतंत्रता) और 26 (धार्मिक कार्यों का प्रबंध) का उल्लंघन है। इसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 29 जिसमें संस्कृति के संरक्षण का अधिकार दिया गया है का भी उल्लंघन होना माना रहा है। भारत विविध संस्कृतियों का देश है। अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों को अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा, परंपरा बनाए रखने का अधिकार देता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ और आदिवासी रूढ़िगत कानून (Customary Laws) इसी संस्कृति का हिस्सा हैं।समान नागरिक संहिता (UCC)संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत नीति निर्देशक तत्व है, मौलिक अधिकार नहीं है। सरकार का मत है कि UCC संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद 44 में है जो राज्य के नीति निर्देशक तत्व हैं। सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में कह चुका है कि DPSP यानी Directive Principles of State Policy राज्य के नीति निर्देशक तत्व को मौलिक अधिकारों (भाग-3) पर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। यानी समानता के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।इसी प्रकार अनुच्छेद 371 और पर्सनल लॉ की मान्यता पर आधारित है। संविधान सभा की बहस में ही तय हुआ था कि पर्सनल लॉ को तुरंत खत्म नहीं किया जाएगा। हिन्दू कोड बिल भी संसद ने अलग से बनाया था, जबरन नहीं थोपा गया था।अनुच्छेद 44 भाग-4 में है, जो केवल निर्देश है, आदेश नहीं। इसे लागू करने के लिए संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकार अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) और 29 (संस्कृति का अधिकार) को खत्म नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने मिनर्वा मिल्स केस में कहा था कि मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्व में संतुलन जरूरी है, राज्य के नीति निर्देशक तत्व को मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
मध्य प्रदेश के UCC बिल के संदर्भ में अब यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि समान नागरिक संहिता (UCC) बिल राष्ट्रपति के पास जाने के बाद क्या होगा।यहां यह बताना आवश्यक होगा कि संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति के पास बिल जाने के बाद 4 संभावनाएं हैं। पहली संभावना में इस बिल पर राष्ट्रपति की स्वीकृति होती है। इस बिल पर यदि राष्ट्रपति हस्ताक्षर कर देता है तो बिल कानून बन जाएगा ।लेकिन राष्ट्रपति भवन इस तरह के बिल पर स्वीकृति से पूर्व उत्तराखंड की तरह विधि मंत्रालय, गृह मंत्रालय और अल्पसंख्यक आयोग से राय ले सकता है।
दूसरी संभावना इस बिल को राष्ट्रपति द्वारा वापस भेजना है।जिसमें राष्ट्रपति इस बिल को पुनर्विचार के लिए राज्यपाल के माध्यम से विधानसभा को वापस भेज सकता है। तब विधानसभा को दोबारा संशोधन करना होगा।
यहां यह बताना भी आवश्यक होगा कि राष्ट्रपति द्वारा इस बिल को रोक भी लगाई जा सकती है जिसे (Absolute Veto) कहा जाता है। राष्ट्रपति चाहे तो बिल को बिना कारण बताए रोक भी सकता है, तब बिल खत्म हो जाता है।अंतिम और महत्वपूर्ण संभावना यह है कि संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति यदि समझे कि बिल मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 25-26),29 और 5वीं अनुसूची के खिलाफ है, तो सुप्रीम कोर्ट से राय मांग सकता है।
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वाले लोग सीधे तौर पर भी सुप्रीम कोर्ट की शरण ले सकते हैं। अब आगे देखना यह है कि आगे राष्ट्रपति इस बिल को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 25-26), 29और 5वीं अनुसूची के खिलाफ मानकर सुप्रीम कोर्ट से राय मांग सकते हैं या बिल वापस कर सकते हैं ।या सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस बिल पर अपना निर्णय पारित करता है।

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