पुस्तकें बोलती हैं, पढ़ने वाले सुनते हैं — बिलासपुर के साहित्यप्रेमियों ने मनाया अनूठा पुस्तक उत्सव’
बिलासपुर, 23 अप्रैल। एक तरफ मोबाइल की चमकती स्क्रीन, दूसरी तरफ पुस्तकों की महकती दुनिया। आज के दौर में जब डिजिटल शोर हर ओर है, तब बिलासपुर के कुछ साहित्यप्रेमियों ने मिलकर यह साबित किया कि पुस्तकों का जादू आज भी जिंदा है और उसकी जरूरत पहले से कहीं अधिक है।
विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर आज दिनांक 23 अप्रैल 2026 को आज की जनधारा समाचारपत्र के बिलासपुर स्थित कार्यालय में एक विशेष साहित्यिक गोष्ठी और परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस सार्थक आयोजन में नगर के वरिष्ठ साहित्यकारों, शिक्षाविदों और उत्साही युवाओं ने सहभागिता की।
कार्यक्रम में डॉ. सुभाष दत्त झा, सेवानिवृत्त प्राचार्य मनेंद्रगढ़, डॉ. आरती झा, सेवानिवृत्त प्राध्यापक हिंदी शहडोल, श्री डी. डी. पाठक, सेवानिवृत्त शासकीय अधिकारी, डॉ. सर्वेश पाठक, साहित्यकार एवं दो कविता संग्रहों की रचनाकार, श्रीमती संगीता झा, जीवन बीमा निगम, श्री शिवमंगल शुक्ल विश्व हिन्दी परिषद, राष्ट्र सृजन अभियान, प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट,जो साहित्य सृजन का यूट्यूब चैनल भी संचालित करते हैं, तथा युवा साथी नूपुर शर्मा और श्रद्धा त्रिवेदी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
गोष्ठी का शुभारंभ डॉ. सुभाष दत्त झा के उद्बोधन से हुआ। उन्होंने बताया कि 23 अप्रैल 1995 को यूनेस्को द्वारा पेरिस में पहली बार विश्व पुस्तक दिवस मनाया गया था। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि महान नाटककार विलियम शेक्सपियर का जन्म और मृत्यु दोनों ही संयोगवश 23 अप्रैल के दिन हुए, जो इस तिथि को साहित्य जगत के लिए और भी पवित्र बना देते हैं।
गोष्ठी की सर्वाधिक चर्चित बात रही डॉ. आरती झा का व्यावहारिक सुझाव। उन्होंने पुस्तक पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए 20-20-20 का सरल और अचूक फॉर्मूला सुझाया। उनके अनुसार प्रतिदिन 20 मिनट में 20 पृष्ठ पढ़ते हुए यदि 20 दिन लगातार पढ़ा जाए, तो पढ़ने की आदत स्वतः ही स्थायी हो जाती है।
प्रमुख रूप से श्री शिवमंगल शुक्ल ने डिजिटल डिटॉक्स की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने वाले आयोजन, सक्रिय पुस्तकालय और सामुदायिक सहयोग आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है।
प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती सर्वेश पाठक ने पुस्तकें पढ़ने की आदत बच्चों में बचपन से ही डालने के लिए विदेशों के उदाहरण देते हुए बताया कि वहां तीन माह से तीन साल के बच्चों को। रंगबिरंगी पुस्तकें दिखाई जाती हैं, उनसे अधिकाधिक परिचय कराया जाता है जिससे आगे चलकर बच्चे पुस्तकों में रुचि लेना प्रारंभ कर देते हैं और डिजिटल संसाधनों के हानिकारक प्रभावों से बच पाते हैं। उन्होंने ज्यादा लाइब्रेरी खोलने पर भी जोर दिया।श्री डी. डी. पाठक ने सभी उपस्थितजनों को विश्व पुस्तक दिवस की हार्दिक बधाई दी।
संगीता झा ने सुझाया कि नई पीढ़ी में पढ़ने की रुचि जगाने हेतु बड़ी पुस्तकों को छोटे-छोटे सरल संस्करणों में प्रस्तुत किया जाए। युवा प्रतिभागी नूपुर शर्मा ने कहा कि मोबाइल के स्थान पर पुस्तकें पढ़ने से मन भी लगता है और स्क्रीन टाइम भी घटता है। श्रद्धा त्रिवेदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मोबाइल जहां आंखें और मन दोनों को हानि पहुंचाता है, वहीं पुस्तकें हर इंसान की सच्ची और निःस्वार्थ साथी होती हैं।
इस अवसर पर आज की जनधारा की ओर से सभी सहभागियों को साहित्यिक आलेखों से समृद्ध एक स्मारिका भेंट की गई।
गोष्ठी के समापन पर आज की जनधारा के स्थानीय संपादक प्रभात दत्त झा ने सभी साथियों का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए जो बात कही, वह पूरे कक्ष में गूंज उठी और हर मन को छू गई — जहां पुस्तकें पढ़ी जाती हैं, वहां बंदूकें नीचे रखनी पड़ती हैं। यह केवल एक वाक्य नहीं था, यह उस पूरी परिचर्चा का सार था, जो बिलासपुर के साहित्यप्रेमियों ने मिलकर आज जीया।








